Hindi Stories

Vishwas Hona Chahiye

By BJP Boy
  • Feb 23, 2015
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विश्वास होना चाहिए
"वीर जी," कानों में पहले कभी न पड़ा संबोधन गया तो मैंने पीछे मुड़ कर देखा। किसी गिरहर इमारत जैसी वे मेरे ठीक पीछे खड़ी थीं। सब तरफ़ से झूल गया बुढ़ापे का शरीर। सामने के दाँत टूटने लगे थे जिसके कारण होंठ अपने टिके होने का आधार खो रहे थे और पूरा चेहरा डोनाल्ड डक जैसा लगने लगा था। खिचड़ी बाल कहीं-कहीं पर काफ़ी कम हो गए थे और गंजापन झलकने लगा था। मदद की गुहार करती-सी आँखें जिनकी उपेक्षा करके आगे बढ़ जाना संभव नहीं होता। दाहिने गाल पर एक काला मस्सा था जो उनके गोरे रंग पर आज भी डिठोने-सा दमकता लग सकता था लेकिन मस्से पर उगे सफ़ेद बालों के गुच्छे ने उनके चेहरे को विरूपित कर रखा था। उनके माथे पर गहरी सिलवटें थीं जिनमें पसीने की महीन लकीरें चमक रही थीं। उन्होंने कृपाण धारण कर रखी थी जिसकी म्यान का पट्टा उनके कंधे पर दुपट्टे के नीचे से झाँक रहा था।

उनके लिए आदतन वीरजी, कह बैठना अधिक सुविधाजनक रहा होगा। 
"जी," मैंने उनसे पूछा।
"यह बैंक वाले मुझे चेकबुक नहीं दे रहे। कहते हैं पहले ही दी जा चुकी है। लेकिन मैंने तो चेकबुक कभी ली ही नहीं।" 
उन्होंने इतनी-सी बात को बहुत बेचैनी से छटपटाते हुए कहा।

मैंने सोचा कि बुढ़ापे में धीरज बहुत जल्दी छूट जाता है शायद उनकी बेचैनी की यही वजह होगी।
"तो बताइए, मैं इसमें क्या कर सकता हूँ?" मैं भी तो उन्हीं की तरह एक खातेदार था, भला मैं क्या कर सकता था,'' सोच कर मैंने कहा।
"आप मेरी मदद कर दो। वहाँ किसी से कह कर मुझे चेकबुक दिलवा दो।" उन्होंने मुझे लेकर जाने किस तरह का विश्वास पाल लिया था।
"आपकी पासबुक देखूँ ज़रा।" उनके हाथ में पासबुक देखकर मैंने उनसे कहा।
"मैं बहुत जल्दी में हूँ। आप मेरा काम जल्दी करवा दो।" उन्होंने मुझे पासबुक देते हुए कहा। आवाज़ की बेचैनी के साथ आंखों में चौकन्नापन भी आ गया था।
"यह सुखविंदर कौन है?" मैंने पासबुक देखकर पूछा।
"मैं हूँ जी।"
"और ये मनजीत?"
"बेटी है।" उन्होंने मेरे सवालों के जवाब जल्दी-जल्दी इस उम्मीद में दिए कि मैं आश्वस्त हो जाऊंगा तो उनको चेकबुक दिलवाने के काम में स्र्चि लेने लगंूगा।
"आपका तो नौ साल पुराना खाता है। सिऱ्फ एक बार बीस हज़ार स्र्पया आपने निकाला है, विदड्राल भरा था आपने," मैंने पासबुक देखते हुए उनके खाते का विवरण उन्हें सुनाया।
"यही तो मैं भी कह रही हूँ कि चेकबुक मुझे कभी मिली ही नहीं," उन्होंने छटपटाते हुए दोहराया।
"लेकिन बहिन जी, आप क्यों परेशानी उठा रही हैं? बेटी को कहिए वही ये सारे काम किया करे, आप कहां बुढ़ापे में।" मैंने उन्हें काउंटर का सहारा लेकर खड़े होते हुए कुछ-कुछ कराहते-सा सुना।
"यह सब मुझसे मत बोल। मैं ग़रीब बहुत परेशान हूँ। अभी मेरे को टटि्टयाँ लग जाएँगी, मेरा काम जल्दी से करवा दे।" वह रोने लगीं।
"अच्छा-अच्छा आप परेशान मत होइए। चलिए बात करके देखता हूँ," मैंने उनको रोने से रोकते हुए कहा और उनके साथ चेकबुक वाले काउंटर की तरफ़ बढ़ गया।

वहाँ बैठा अधिकारी मेरा कुछ परिचित था। उसने अन्यमसस्क भाव से मेरी बात सुनी और बहुत समझाने पर चेकबुक देने पर राज़ी हो गया।
"मेरा काम जल्दी करवा दो भाई," उन्होंने अपनी बेबस आवाज़ में फिर कहा।
"अब ज़रा देर तो लगेगी, आप आराम से बैठ जाइए।" मैंने उन्हें समझाया।
"मैं गुस्र्द्वारे का बहाना करके घर से निकली हूँ। मुझे जल्दी घर लौटना है," उन्होंने अपनी छटपटाहट की वजह बताई ताकि मैं और जल्दी उनका काम करवाने की कोशिश करूँ।
"घर में कौन-कौन हैं?" मुझे उनसे बात करने और उनके बारे में और जानने की इच्छा हुई।
"यह सब मुझसे मत पूछो भाईजी, मेरा काम करवा दो। मैं किसी तरह जल्दी घर पहुँच जाऊँ," वह फिर रोने लगी।
"आप क्यों घबरा रही हैं? आपका काम हो तो रहा है," इस बार मैंने कुछ झुँझला कर कहा।
"क्यों घबरा रही हूँ? कहीं मेरे बैंक में आने का पता पड़ गया तो सब मुझसे उगलवा लेंगे कि मेरे पास कितना पैसा है? बेटी को पता लग जाएगा तो उसके आदमी को तुरंत रुपयों की ऐसी ज़रूरत आ पड़ेगी जो पूरी न हुई तो उसे जेल हो जाएगी। दारजी को मालूम पड़ जाएगा तो उन्हें महँगी-महँगी शराबों के नाम याद आने लग पड़ेंगे, और जो कहीं बेटे को पता लग गया तो वो जुआरी बंदा तो मार-मार कर मेरी जान ही ले लेगा कि उसके माँगने पर मैंने मना करके इतने पैसे क्या सीने पर रखकर ले जाने के लिए जमा किए हैं?" मेरी झुँझलाहट ने उन्हें खिजा-सा दिया था।
"कहीं काके को पता लग गया कि मेरे पास रुपया हैं तो,"जमा रुपए उनके लिए एक आफ़त बन गए थे जिन्हें याद करके वह काँप उठी थीं।
"अरे," मैं इतना ही बोल सका।
"सौ धारों से दूध पिलाकर. . ." उन्होंने सीने पर मुक्के मारते हुए कहा। अंदर से फूटी पड़ रही रूलाई में बाकी के शब्द डूब गए। जैसे पूरे शब्द न बोले जाने के कारण उनकी दलील कमज़ोर पड़ रही हो और वह सीने पर दोहत्थड़ मार-मार कर अपनी बात में वज़न पैदा करती हों।

"कैसा बेटा है?" उनकी बेआवाज़ रुलाई पर मैं बुदबुदाया।
"देखोगे कैसा बेटा है?" उन्होंने कहा और पीठ की तरफ़ से अपना कुर्ता ऊपर उठा दिया। 

माँस छोड़ चुकी पीठ की झूली हुई खाल पर बकसुए के ताज़े नीले और लाल निशान छपे हुए थे जिन्हें देखकर मैं सिहर उठा। वह यह भी भूल गई कि वह बैंक में थीं और किसी अनजान आदमी के सामने अपनी पीठ उघारी करके खड़ी थीं।
मैंने उनके हाथ से कुर्ता छुड़ा कर नीचे खींचा और उनके हाथ को अपने हाथ में लेकर कुछ देर चुपचाप खड़ा हो गया। उन्होंने नाक सुड़की और हाथ छुड़ा कर दुपट्टा आँखों पर रख लिया।
"क्या कहूँ बहिन जी।" मैंने अपने आपको असहाय पाया।
"ज़रा मेरे को पता कर दो कि कितना पैसा है खाते में?" उन्होंने मेरे असहाय होने को एक किनारे करते हुए कहा।
"दो लाख आठ हज़ार रुपए हैं।" तब तक पास बुक तैयार हो चुकी थी जिसे देखकर मैंने उन्हें बताया।
"भैया, अब जल्दी से मेरी चेकबुक भी दिलवा दो, मैं चलूँ।" उन्होंने बेचैन होकर मुझे फिर याद दिलाया।
"अच्छा ज़रा यह तो बताइए, चेकबुक का आप करेंगी क्या?" मैंने उत्सुकता का नाट्य-सा करते हुए पूछा। शायद उनका ध्यान पीठ की चोटों की तरफ़ से हटाने के लिए।
"एक ज़मीन मिल रही है दो लाख में उसे ख़रीदना चाहती हूँ।" उन्होंने बताया।
"तो?" ज़मीन ख़रीदने और चेकबुक का संबंध न समझ पाने के कारण मैंने पूछा।
"तो क्या?" उनकी सारी चोटें पटा गई थीं और वह मुझसे बतियाने लगी थीं।
"तो यह कि ज़मीन ख़रीदने से चेकबुक का क्या मतलब है?" मैंने उनसे पूछा।
"अरे बुद्धूराम, ज़मीन के रुपए का भुगतान करूँगी तो चेक से ही तो करूँगी।" उनका इस तरह बेतकल्लुफ़ होना बहुत अच्छा लगा।"
"लेकिन घर में तो किसी को पता नहीं कि आपके पास इतना रुपया है, ज़मीन ख़रीदेंगी तो पता नहीं लग जाएगा?" मैंने उनसे पूछा।
"नहीं, पता नहीं चलेगा।" उन्होंने निश्चिंत भाव से कहा।
"क्या होगा ज़मीन ख़रीद कर?" मैंने पूछा।
"मैंने कहीं-कहीं से जोड़ कर जो ये रकम इकठ्ठा की है तो कोई अपने लिए थोड़े ही की है। आज एक बात तुझे कहती हूँ कि जिस घर में शराब और जुआ पहुँच जाएँ वहाँ किसी भी दिन ऐसी नौबत आ सकती है कि जान के लाले पड़ जाएँ। मैंने ये रकम रब न करे, किसी ऐसे ही मनहूस दिन के लिए जोड़ कर रखी है। सोचती हूँ कि ज़मीन लेकर कुछ दिनों बाद उसे बढ़े हुए दामों पर बेच दूँगी तो खाते में ज़्यादा रकम हो जाएगी।" मैं अवाक उनको सुन रहा था और चेहरे पर आते-जाते भावों को देख रहा था।"
"आपको कोई ठग लेगा। आपके पैसे भी ले लेगा और ज़मीन भी नहीं देगा। आपके साथ तो कोई है भी नहीं, आप ऐसे बेईमान आदमी का क्या करेंगी?" मैंने उन्हें समझाया।
"नहीं, मैं चेक नंबर नोट कर लूँगी।" उनकी आँखों और चेहरे पर समझदारी की चमक उभरी।
"आप ज़मीन ख़रीदने के झंझट में पड़ती ही क्यों हैं? दो लाख रुपए तीन साल के लिए फिक्स करा दीजिए, हर महीने आपको नौ सौ पचान्नबे रुपए ब्याज में मिलते रहेंगे। वो रुपए भी अगर आप नहीं लेंगी तो मूलधन में जुड़ते जाएँगे।"
"हाँ सच्ची तो वीर जी। ये तो भोत अच्छी गल बताई।" उन्होंने दाहिने हाथ की झुर्रीदार मुठ्ठी में से तर्जनी को बाहर निकाल कर अपने निचले होंठ पर रखते हुए कहा।
"आप ऐसा ही कीजिए," उनकी उस सुंदर मुद्रा को मैं देखता ही रह गया।
"और हाँ, फार्म में ये भी तो लिखना होगा न कि मेरे बाद यह पैसा किसको मिले। तो वीर जी, मैं उसमें अपने बेटे का नाम डाल दूँगी।" उनकी आँखें अचानक मेरे आर-पार चली गई।

मुझे लगा काके सिर्फ़ पैसा जानता है, माँ को नहीं जानता। उसके मरने के बाद जब उसे यह पैसा मिलेगा तो शायद वह जान सके कि माँ क्या होती है?"

 

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