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Padhiye Mahabharat Ki Anokhi Prem Kahani

By Parul Sharma
  • Jan 04, 2017
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‘नहीं देखा था किसी ने बचपन उसका, पांच पति होते हुए भी जिसे मिल न पाई सुरक्षा, जीवन भर तरसी एक बूंद प्रेम को’


इन विशेषताओं को पढ़कर कोई भी कल्पना कर सकता है कि हम महाभारत की सबसे चर्चित पात्र द्रौपदी की बात कर रहे हैं. द्रौपदी के बारे में कहा जाता है कि उनका जन्म प्राकृतिक रूप से नहीं बल्कि राजा द्रुपद ने एक यज्ञ करके द्रौपदी और अपने पुत्र धृष्टद्युम्न को प्राप्त किया था. द्रुपद ने कई वर्षों तक अपनी पुत्री द्रौपदी को स्वीकार नहीं किया था.


महाभारत में द्रौपदी के बारे में ये सत्य अधिकतर लोग जानते हैं लेकिन क्या आप जानते हैं कि पांच पतियों से विवाह करने के बाद पांचाली बनी द्रौपदी को अर्जुन से नहीं बल्कि महारथी और दानवीर माने जाने वाले कर्ण से प्रेम था. लेकिन अपने पिता द्रुपद के भीष्म से प्रतिशोध लेने की प्रतिज्ञा और मान सम्मान के कारण द्रौपदी और कर्ण कभी एक-दूसरे को अपने मन की बात नहीं कह पाए. आइए, विस्तार से जानते हैं इन दोनों की प्रेम कहानी.

 

महारथी कर्ण को था द्रौपदी से प्रेम


पांचाल देश के राजा द्रुपद की पुत्री होने के कारण द्रौपदी से जुड़ी हुई कई विशेष बातें कई राज्यों में फैली हुई थी. उनकी सुंदरता, बुद्धि और विवेक को देखकर कई राजा द्रौपदी पर मोहित थे.

लेकिन महारथी कर्ण को द्रौपदी का निडर स्वभाव बहुत पसंद था. द्रौपदी अपने सखियों के साथ भ्रमण करने के लिए आया करती थी. द्रौपदी को देखते ही कर्ण को भी उनसे प्रेम हो गया.

 

स्वयंवर से पहले ही द्रौपदी को हो गया था कर्ण से प्रेम


जब द्रौपदी के स्वयंवर के लिए राजा द्रुपद ने द्रौपदी के कक्ष में दासी द्वारा महान योद्धाओं के चित्र भिजवाए थे, तो उनमें कर्ण का चित्र भी था क्योंकि दुर्योधन का मित्र होने के कारण सभी कर्ण का सम्मान करने के साथ उन्हें राजसी परिवार के वंश की तरह मानते थे.


द्रौपदी कर्ण का चित्र देखकर उन्हें पसंद करने लगी थी. जब स्वयंवर का दिन आया तो द्रौपदी की दृष्टि सभी राजाओं और पांडवों में से कर्ण को ढूंढ़ रही थी.


इसलिए न हो सका कर्ण से विवाह


द्रौपदी को उनके पिता राजा द्रुपद ने भीष्म से प्रतिशोध लेने की प्रतिज्ञा के बारे में बहुत पहले ही बता दिया था. साथ ही द्रौपदी ये भी जान चुकी थी कि कर्ण एक सूतपुत्र है और अगर उनका विवाह कर्ण से होता है तो वो जीवनभर एक दास की पत्नी के रूप में पहचानी जाएगी. साथ ही कर्ण से विवाह करने के बाद अपने पिता की प्रतिज्ञा को पूरा करने में वो सहयोग नहीं कर पाएगी. इस दुविधा में पड़कर द्रौपदी ने अपने दिल की बजाय दिमाग की बात सुनते हुए कर्ण से विवाह का इरादा छोड़ दिया.


स्वयंवर में किया कर्ण का अपमान


स्वयं अपने आप से निराश हो चुकी द्रौपदी ने स्वयंवर में एक कठोर निर्णय लेते हुए कर्ण को सूतपुत्र कहकर अपमानित किया. द्रुपद पुत्री ने भरी सभा में कर्ण को कहा कि वो एक सूतपुत्र के साथ विवाह नहीं कर सकती है. इस तरह कर्ण को बहुत आघात पहुंचा कि द्रौपदी जैसी निडर और क्रांतिकारी सोच रखने वाली स्त्री उनकी जाति के आधार पर इस तरह अपमान कर सकती है.


दोनों ने कभी नहीं कही एक-दूसरे से अपने मन की बात


स्वयंवर में द्रौपदी से अपमानित होने के बाद कर्ण के मन में द्रौपदी के लिए कड़वाहट भर चुकी थी, जबकि द्रौपदी अपने इन शब्दों का सत्य जानती थी. पांच पांडवों से विवाह के बाद भी द्रौपदी कभी कर्ण को अपने मन से निकाल नहीं पाई थी.

 

चीरहरण के समय पर द्रौपदी को कर्ण से थी उम्मीद


जब पासों के खेल में पांडव अपना सबकुछ हारते हुए द्रौपदी को दांव पर लगा चुके थे, तो दुर्योधन ने दुशासन को द्रौपदी के वस्त्र हरण करके अपनी जंघा पर बिठाने का आदेश दिया था. इस दौरान सभी खेल के नियम का बहाना बनाकर मौन थे जबकि द्रौपदी को सभा में मौजूद कर्ण से सहायता की उम्मीद थी. लेकिन आत्मग्लानि होने के कारण द्रौपदी ने कर्ण से सहायता नहीं मांगी. वहीं कर्ण भी स्वयंवर में अपने अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए मौन रहे.

 

मृत्युशैय्या पर लेटे भीष्म को बताया कर्ण ने रहस्य


जब असंख्य बाण लगने पर भीष्म पितामहा मृत्युशैय्या पर अपनी मौत की प्रतीक्षा कर रहे थे, उस समय महारथी कर्ण भीष्म से मिलने के लिए उनके पास पहुंचे. उन्होंने भीष्म को द्रौपदी से आजीवन प्रेम करने का रहस्य बताया. जब वो अपनी प्रेम कहानी से जुड़ी विभिन्न घटनाएं भीष्म को बता रहे थे तो ये बात द्रौपदी ने भी सुन ली थी. उस समय द्रौपदी को ज्ञात हुआ कि केवल वो ही नहीं बल्कि महारथी कर्ण भी उनसे बहुत प्रेम करते हैं.


…और इस तरह अंत हुआ इस प्रेम कहानी का


भूमि से मिले श्राप के कारण युद्ध के समय कर्ण के रथ का पहिया भूमि में धस गया था. साथ ही वो मंत्र भी भूल चुके थे. इस कारण स्वयं की रक्षा नहीं कर सके और अर्जुन ने पीछे से प्रहार करते हुए कर्ण को मृत्यु के घाट उतार दिया. इस तरह द्रौपदी के पति ने उसके प्रेम का सदा के लिए अंत कर दिया.

स्वर्ग में कर्ण ने किया था द्रौपदी का अभिनंदन


अपने पांचों पति के साथ स्वर्ग पहुंचने पर महारथी कर्ण ने मुस्कुराते हुए अपने प्रेम द्रौपदी का स्वागत किया था.

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