Hindi Stories

पुत्रवती भव

By ajay mishra
  • May 31, 2015
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मनीषा का तीसरा महिना चल रहा था।घर में सभी बहुत खुश थे, उसकी सास ने सबकी कुशलता के लिए दिवाली की खास पूजा रखवाई थी पूजा के लिए परिवार के गुरुजी आमंत्रित थे। गुरूजी के बारे में पुरे शहर में यह चर्चा थी कि उनका आशीर्वाद कभी खाली नही जाता था। पूरा परिवार पूजा की तैयारियों में जुटा था लेकिन मनीषा की सास ने उसे कोई काम नही करने दिया।अगले दिन पूजा थी,मनीषा पूरा दिन गुरूजी के बारे में सोचती रही, मनोविज्ञान कहता है कि आपका मन जिस चीज पर लगा होता है सपनों में उसका आना स्वाभाविक है, उस रात मनीषा ने भी एक सपना देखा। गुरूजी दिवाली के दिन उसके घर आए,पूजा-यज्ञ विधिवत सम्पन्न कराया।जाते वक़्त मनीषा ने गुरूजी को एक हजार एक रुपए की दक्षिणा दी, जिससे खुश होकर गुरूजी ने आशीर्वाद दिया "बेटा तुझे लक्ष्मी जी का वरदान प्राप्त,उनकी कृपा तुझे संतान के रूप में प्राप्त हो"। 
इतने में ही मनीषा की नींद टूट गयी। घड़ी में देखा तो तीन बजे थे, उसकी आँखों से नींद गायब थी,लक्ष्मी की कृपा यानि पुत्री, सपना ही सही पर कितना बुरा था, मनीषा फिर दुबारा सो न सकी लेकिन उसने निश्चय किया कि वह गुरूजी की इतनी सेवा करुँगी कि वे खुश होकर मुझे 'पुत्रवती' होने का आशीर्वाद ही दें। 
अगले दिन गुरुजी आए,मनीषा ने उनका ख़ास ख्याल रखा,घर के बाकी लोग इसे मनीषा की धार्मिक आस्था ही समझ रहे थे,लेकिन असलियत केवल मनीषा ही जानती थी, जाते-जाते गुरूजी ने मनीषा को 'पुत्रवती' होने का आशीर्वाद दिया, लक्ष्मी की कृपा का नहीं। 
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